My Dear...

Friday, 22 March 2013

पत्रकार और "JOURNALIST" में क्या फर्क है!!!!??


हा हा हाह हा हा.......है ना बड़ा अजीब सवाल!! पर इसमें कुछ फर्क तो जरुर है. कितने लोगों से मैने यह सवाल पूछा, और ज्यादा तर लोगों का जवाब था कि जो अंग्रेजी फर्राटेदार बोलता हो, सैलेरी टकाटक हो, बौस के करीब हो, चाटूकर्ता का ग्यान हो, बहुत बड़ा डिलर हो, झुठों का सरदार हो, बॉस का चम्चा हो, करे एक दिखाए दस काम, और आखिर में कपड़ा ब्राडेड पहनता हो, हाई फाई कार हो, अमेरिकन टूरिस्टर का बैग हो. इसे तो हम "JOURNALIST" कहते हैं. परिभाषा तो बहुत लम्बा है पर मैं क्या कर सकता यह तो लोगों कि राय है. अब तो आपको इसका अंदाजा लग गया होगा कि "पत्रकार" किसे कहते हैं चलिए इसे भी बता ही दिया जाए. कहीं आपको कोई संकोच ना रह जाए. दिखने में गरिब हो, दिखने में लाचार हो, ढ़ाबे कि चाए पिता हो, प्रेस क्लब से अंजान हो, ख़बर के लिए परेशान हो, कपड़े गरिबों कि तरह पहनता हो, जेब में कुछ ही पैसे हों, वह भी परिवार और बच्चों के लिए सोचता हो, दिमाग से कम दिल से ज्यादा सोचता हो, खादी का थैला साथ हो, बस उसकी सवारी हो और साथ-साथ समय से सैलेरी ना मिले आदी आदी....इन्हें हम "पत्रकार" कहते हैं.

      इन सारी बातों को सोचा फिर अपनी नज़रों को इधर उधर घुमाया फिर लगा कि सच्चाई तो है इन सारी बातों में. यह बड़ी अजीब बात है, कुछ ही लोग "JOURNALIST" बन पाते हैं. बाकि सब तो बेचारे पत्रकार ही बन के अपनी जिन्दगी गूजार देते हैं. पत्रकारों को लोग देखते तो ऐसे हैं जैसे कोई सुपर स्टार ही हो, पर उसकी पीड़ा तो पत्रकार ही जानता है. समाचार कि दुनिया में आए मुझे बहुत ज्यादा दिन नही हुआ पर बातों को समझना बहुत जल्दी सीख लिया. ज्यादा तर पत्रकार तो यही सोचते रहते हैं कि अब अगला कौन से चैनल में जाना है. बेचारे थोड़ी लालच उनमें होती है कि सैलेरी बढ़ जाएगी और वह भी समय पर आएगी.....
 
NOTE- (यह सारी बातें कुछ लोगों की राए है, हमने तो बस लिखने की कोशिश की है और अच्छा लगे तो कुछ जरुर बोलें, परिभाषा में कुछ जोड़ना हो तो स्वागत है)

Monday, 18 March 2013


उठ मेरी जान मेरे साथ चलना है तुझे......


16 दिसम्बर 2012 इन्सानियत के लिए एक खौफनाक दिन. दिल्ली नही, देश नही, दुनिया भी नही बल्कि पुरे कायनात को झकझोर देने वाला दिन था. आपको पता है क्या हुआ था?? नही पता?? अब तो बताने में भी मुझे शर्म आती है. दरअसल कुछ लोग जो अपने आप को मर्द कहते थे उन लोगों ने एक फूल को कुचल डाला और फिर उसे कुड़े में फेंक दिया. लोगों ने उसे देखा, जज़बाती हो गए, उसे फिर से बाग़ में खिलते हुए देखना चाहा. पर ऐसा नही हुआ क्योंकि वह फूल सिर्फ टूटा हुआ नही था बल्कि हैवानों ने उसे मसल दिया था, फिर वह मुरझा गया. देश में एक ऐसी लहर चली लगा जैसे अब सब कुछ बदल जाएगा. ऐसा लगा जैसे कथित तौर पर मर्द कहे जाने वाले अब सही में मर्द बन जाएंगे. क्या ऐसा हुआ?? नही!! एक के बाद एक लगातार बलात्कार की घटनाएं अपने देश में होती ही जा रही हैं. हैवान और इन्सान में आसानी से फर्क अब पता किया जा सकता है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि इसका जिम्मेदार कौन है?? इसका जिम्मेदार हमसब हैं, हर एक इन्सान है. लेकिन सवाल यह भी है कि क्या इस गलती का आपको एहसास है?? अगर हां तो भी शर्म आती है और अगर ना तो फिर इस दुनिया आपको जिने का कोई हक नही!!!
 
तेरे सर का आंचल तो बड़ा अच्छा लगता है,
इसमें थोड़ा गुरुर होता तो क्या बात होती...
                                            (कैफी आज़मी)

शायरों, अदीबों, फिल्मकारों, सहित्यकारों, अफसानानिगारों, दिलवालों, मजनुओं, आशिकों, माओं, पिताओं, पत्रकारों सभी ने तेरे बारे में लिख लिया. लेकिन तुझे दिल से इज्जत किसने दी!!!?? अब तक तू इस जा़लिम दुनिया में पिसती जा रही है और दुनिया एक तमाशा कि तरह देखे जा रहा है. क्या यही तेरी उनवान है?? कन्धों से कन्धा मिला लो फिर तो यह जालिम तेरे नाम से पनाह मांगेगे.
                            जब लहर चलती है तो देश जाग जाता है, जब अन्ना आए थे तो लगा जैसे देश में कुछ बदलाव आएगा. लगा जैसे सूरज कि किरण अब ठन्ढी़ हो जाएंगी. ज़मीन आसमान पे चला जाएगा, और आसमान जमीन पर!!! लेकिन क्या ऐसा कुछ हुआ?? नही!!! अरे बुलन्द आवाज़ में बोलो.. नही :(    यही हकिकत है!! अपने देश के लोग जज़बाती हो जाते हैं कुछ ही दिन अपने ताक़त का प्रदर्शन करते है और फिर रोटी के फिराक़ में सब कुछ भूल जाते हैं. क्या अगर ऐसे ही चलता रहा तो बदलाव आएगा?? नही!! दिल्ली में दामिनी ने अपनी सहादत दी और ना जाने कितनी ऐसी दामिनी रोज इस दुनिया में होती जा रही हैं.
             अब सोचना कुछ भी नही और करना कुछ भी नही, बस संकल्प करना है कुछ बदलने का और अपनी इन्सानियत को दिखाने का , प्रदर्शन करने का....

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे
क़द्र अब तक तेरी तारीख ने जानी ही नहीं
तुझ में शोले भी हैं बस अश्क पिफशानी ही नहीं
तू हक़ीकत भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है एक चीज जवानी ही नहीं
अपनी तारीख का उन्वान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान............


                                  अब बारी आती है सरकार की, यानी यूं कहे हमारे हिफाज़त के ठेकेदारों की. 16 दिसंबर जैसे कितनी घटनाएं हमारे देश में होती जा रही हैं. विदेशियों को भी नही छोड़ते. सच कहूं तो मुझे बचपन कि कहानी याद आती है जब मैं पढ़ा करता था कि इन्सान भी कभी जानवर था, यानी आदीमानव!! सरकार अब कानून को सख्त बनाने कि बात कर रही है, फिर उसे याद आया कि सहमती से सेक्स कि उम्र 18 साल से घटा के 16 साल कर दिया जाए. बड़ी अजीब बात है!!! इससे कैसे हवस को कम किया जा सकता है?? यह तो मेरे समझ से बाहर कि बात है. जितने समाजशास्त्री मेरे जानने वाले थे सभी को कलयुग के मोबाइल फोन से बात कर लिया. वह भी हैरान थे, मैं भी हैरान था कि आखिर यह कैसे ख़त्म होगा. सरकार और कानून मतदान के लिए उम्र या यूं कहें हमारे मत का अधिकार 18 साल के उम्र में देता है और सरकार सेक्स करने का उम्र 16 साल करने के तैयारी में है. क्या बात!!!
               मुझे तो बस अब एक ही विज्ञापन याद आता है जो कि बचपन से सुनते आ रहा हूं जब मां कि गोद में खेला करता था और दादा के साथ बाजार घुमने जाता था. ""पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें"" यह एक वाशिंग पाउडर का विज्ञापन है. अब सरकार इसी आधार पर कानून बनाने के फिराक मे है... ""पहले सेक्स करें, फिर मतदान करें""