My Dear...

Wednesday, 28 March 2012

बस यादें रह जाती हैं..... अभी क्यूँ आए शादी मे आते

बस यादें रह जाती हैं..... अभी क्यूँ आए शादी मे आते

    जब घर से निकलते हैं तो यह नही पता होता आगे क्या होगा। इन्सान सोचता तो बहुत है पर लम्बी चौड़ी सोच रखने वाला इन्सान कभी यह नही सोचता यह ज़िन्दगी कितने दिन की।
    घर से निकलता हूं तो माँ की दुआएं लेता हूँ यह सिर्फ इसलिए कि हम सुरक्षित रहें और उन्नती करते रहें। घर से निकलते ही माँ पूरे दिन दूआएं करती है और इस फिक्र मे रहती है कि मेरा लाल कब आएगा। पर सोचिए अगर उसका लाल एक सफेद कपड़े मे लिपटा हुआ लम्बा चौड़ा सोया हुआ हो, और अगर उसका लाल घर से जाए चमचमाती PULSAR गाड़ी से और आए AMBULANCE से तो उस ममता का क्या होगा???

      रात को दस बजे दफ्तर मे था। बहुत खुश था कि घर जाउंगा तो निंद अच्छी आएगी क्योंकि दफ्तर के सारे काम अच्छे हो गए थे। क़रीब 12 बजे रात मे घर पहुंचा, खाना खा कर अख़बार पढ़ रहा था, जभी मेरे दोस्त शाकीर ने फोन किया और कहा यार "NIKHIL IS NO MORE"........ मै दंग रह गया और यकीन नही कर रहा था, कि क्या यह सच है। उसी रात मे मै अस्पताल की तरफ रवाना हो गया। पहुंचा तो देखा माहौल मातम का फैला हुआ है। कुछ लोग अपने दोस्त की यादों मे पागल हो रहे थे, कुछ लोग अपने अपनो को देख कर मातम कर रहे थे, वही एक पिता अपने बच्चे की ख़्वाहिशों को याद कर के एक लम्बी आंसूओ की धारा बहा रहा थे, जैसे बरसाती नदी अपने पूरे उफान पर है। पर हम इन्सान कर क्या सकते हैं?? हमारे बस मे कुछ भी नही। जब जिसकी लिखी होती है उसे जाना ही होता है। पर अफसोस तो बहुत होता है। रोना धोना तो लाज़िम है, आखिर दोस्त था अपना। रात दो बजे जब निखील को लेकर उसके घर पहुंचे तो सिर्फ एक ही बात मेरे ज़हन मे आ रही थी की उस माँ का क्या होगा जिसने 24 सालों से फूलों की तरह पाला होगा। फिर मुझे प्रशुन जोशी की एक ही कविता याद आ रही थी।


माँ
लुका छूपी बहुत हुई सामने आजा ना
कहां-कहां ढ़ूढ़ा तूझे
थक गई है अब तेरी मां

आजा सांझ हूई मुझे तेरी फिकर
धूंधला गई देख मेरी नज़र आजा ना

बेटा
क्या बताउं माँ कहां हूं मै
यहां उड़ने को मेरे खुला आसमान है

तेरे किस्सों जैसा भोला सलोना
जहां हैं यहां सपनो वाला
मेरी पंतग तो बेफीकर उड़ रही है मां
डोर कोई लूटे नही बीच से काटे ना

माँ
तेरी राह तके अखीयां
जाने कैसा-कैसा होए जिया
मेरा चंदा तू है कहां........


जब हम निखील के अंतीम संस्कार के बाद उसके घर के बाहर बैठे थे तो, उसके माँ की बस एक ही बात याद आ रही थी "बेटा अभी क्यों आए हो शादी मे आते ना"........ मानो जैसे जीने का दिल नही कर रहा था। माँ का दर्द होता ही ऐसा है।

आख़िर चला गया वह हम सब को छोड़ कर क्यों कि यह ज़ालिम दुनिया शायद उसे पसंद नही आई......

न भूलेगा वह वक्ते-रूखसत किसी का,
मुझे मुड़के फिर इक नजर देख लेना।

रूखसत होते हैं तुमसे लो संभालो यह साज,
छेड़ों नये तराने कि मेरे नगमों को नींद आती है।

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें,
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें।


love you Nikhil तूम हमारी नज़रों हमेशा ज़िंदा हो....



Friday, 23 March 2012

लो सून लो एक और बात...........

लो सून लो एक और बात........... भले ही लागू हो ना हो।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में सर्कस में बच्चों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। यानि अब चौदह वर्ष से कम आयु के बच्चों का सर्कस में काम करना व उनसे जबरन काम करवाना दोनो ही अपराध ही श्रेणी में आंएगे। बाल-मजदूरी व शोषण पर लगाम लगाने के लिए ही यह कदम उठाया गया है। सरकार व प्रशासन यूं तो समय-समय पर बाल शोषण को रोकने के लिए नए नए कानून व प्रावधानों का सहारा लेती रही है। लेकिन क्या यह कहना उचित होगा कि वह अपने उद्देय में सफल हो पाई है? क्या वास्तव में देश में व्याप्त बाल-मजदूरी व बाल शोषण पर पूरी तरीके से रोक लग पाई है?
सर्कस में काम कर रहे बच्चों की ही बात करें तो, बड़े धड़ल्ले से यहां बच्चों का शोषण  किया जाता है। डरा -धमका कर व मार-पीटकर उनसे काम लिया जाता है। सर्कस का पूरा दारोमदार ही एक तरीके से बच्चों पर होता है। जितना छोटा बच्चा, सर्कस में अजब-गजब तरीके के कर्तब दिखाएगा, दर्शकों की तालियों व भीड़ के साथ साथ उतना ही पैसा वह सर्कस कमा पाएगा। इसलिए बड़ी संख्या में अगवा किए गए बच्चों को सर्कस में बेच दिया जाता है जहां उनसे गुलामों की भांति काम लिया जाता है। वर्ष 2009 के एक सर्वेक्षण में खुलासा हुआ था कि घर से भागे हुए व गुमशुदा बच्चों की एक बड़ी संख्या ऐसे ही सर्कसों में पाई जाती है। सिर्फ सर्कस में ही नहीं, फैक्ट्रियों, ढाबों व कारखानों में बच्चों की एक बड़ी फौज को गैरकानूनी तरीके से काम पर लगाया जाता है। जिनसे लगातार चौबीस घंटे काम लिया जाता है। सरकार को चाहिए कि वह बाल श्रम कानून को और भी सख्त बनांए जिससे कि बच्चों के शोषण पर पूर्णतः रोक लग सके। इसे लागू करने की जिम्मेदारी  भी पूर्णतः सरकार और अदालत पर ही है। बच्चों के मूल अधिकारों का संरक्षण करने के लिए यह जरूरी है कि सरकार इस क्षेत्र में बच्चों को काम पर रखने पर प्रतिबंध लगाती अधिसूचना जारी करे।
देशभर के कई सर्कसों  में बच्चों से गैरकानूनी तरीके से काम कराया जा रहा है और कई जगह तो सर्कस की आड़ में उनका यौन शोषण तक हो रहा है। खासतौर पर मध्यपूर्व और नेपाल से बड़ी संख्या मे बच्चों को सर्कस में काम दिलाने के प्रलोभन से भारत लाया जाता है और इनमें से कई को वेयावृति में धकेल दिया जाता है। आजकल सर्कस उद्योग में बच्चों का इस्तेमाल एक तरीके से चलन बन गया है। जहां सर्कस की आड़ में उनका यौन शोषण किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को जहां एक तरफ बाल श्रम के विरोध में एक पहल के रूप में देखा जा रहा हैं, वहीं दूसरी तरफ इस पर सवालिया निशान  भी लगा दिए गए है। कुछ लोगों का तर्क है कि जिस तरीके से फिल्म उद्योग, विज्ञापनों व मॉडलिंग की दुनिया में बच्चों का बढ़-चढ़कर इस्तेमाल किया जा रहा है, ठीक उसी तरीके से सर्कस में भी बच्चों का इस्तेमाल किया जा रहा हैं, सर्कस भी एक कला है, और इसे बचपन से सीखना पड़ता है। परंतु वास्तविकता तो यह है कि चाहे वह किसी फिल्म का सेट हो या फिर सर्कस का मंच। हर तरफ जमकर बच्चों का शोषण किया जाता है। मात्र मारना-पीटना व मानसिक यातनांए देकर काम करवाना ही बाल शोषण के दायरे में नहीं आता बल्कि आवश्यकता से अधिक काम लेना व कानून व प्रावधानों द्वारा निहित तय घंटों के विरल लगातार चौबीसों घंटें काम लेना भी इसकी कोटि में आता है। सर्कस में समाज के उस गरीब तबके के बच्चे काम करते हैं, जो पूर्ण रूप से लाचार व बेबस है और अगर ऐसे में बच्चों के लिए एक पुनर्वास नीति बनाए जाने की घोषणा की जाती है तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता।
अब देखना यह है कि सरकार किस तरह...................

Thursday, 22 March 2012

सुबह अंधेरा छाया हुआ था और कहीं रात में भी उजालों की जगमग थी…...

सुबह अंधेरा छाया हुआ था और कहीं रात में भी उजालों की जगमग थी…...
इस पंक्ति को पढ़ने से पहले यह ना समझ लें की वहाँ धूप नही थी। बल्कि आप
यह ज़रुर समझ लें कि हर सुबह उनके लिए अंधेरा ही होता है....।
           रविवार का दिन था शाम में दफ्तर भी जाना था तभी सुबह-सुबह
समाज सेवा करने का मौका मिल गया। हाई कोर्ट के सीनीयर वकील अशोक अग्रवाल
और जाने माने समाज सेवी ने मुझे फोन कर के कुछ नेक काम करने के लिए पूछा।
मैने हाँ किया और चल पड़ा उनके साथ। कारवाँ हमारा दिल्ली की झुग्गियों की
तरफ चला। थाना उस्मानपुर दिल्ली का एक बहुत बड़ा इलाका जहाँ पूरी झुग्गी
ही झुग्गी। हमें वहाँ यह देखना था की यहाँ के कितने बच्चे स्कूल का दर्शन
देते हैं। उस झुग्गी बस्ती में घुसते ही कुछ अलग ही नज़ारा था जिसे आज तक
भूला नही जाता और कुछ भी खाने से पहले उस मंज़र को याद करता हूँ। देखा की
एक बूढ़ी औरत एसी सोई हुई थी जैसे की उसमे कोई जान नही हो। मैने उठा के
पूछा ‘अरे क्या हुआ अम्मा?? उसने कुछ जवाब नही दिया, फिर उसके घर से एक
लड़का निकला, उससे मैने पूछा तो कहा कि परसो से इसने खाना नही खाया है।
दंग रह गया मैं। मैने पूछा तुम क्या करते हो? उसने कहा भीख मांगता हूँ
साहब। मेरी आँखें नम हो गईं। बार-बार यही ख़याल आता था कि हमारे पूर्व
राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम ने तो 2020 में राष्ट्र को विक्सित करने का
सपना तो बुन लिय था पर शायद उन्होंने इस तरह का नज़ारा कभी नही देखा
होगा। लड़के से पूछा दिन भर में कितना इकट्ठा कर लेते होगे? उसने उदासी भरी
आवाज़ में बोला 15-20 रूपये रोज़ कर लेता हूँ। मैने पूछा फिर अपनी दादी
को खाना क्यों देते???? चेहरे पर बिना कोई उम्मीद और ख्व़ाब, आँखों मे
पानी सूखे हुआ जैसे कोई बंजर ज़मीन हो, फिर कहता है सारे पैसे का खाना ही
लेंगे तो कमरे का किराया कहाँ से देंगें। इस छोटे से कंधे पर इतनी बड़ी
ज़िम्मेदारी!!!!! INDIA SHINING………….
   रईस और बड़े घर के बच्चे तो स्कूल भी अपने पापा के बड़ी वाली कार मे बैठ कर PIZZA ,BURGER  खाते हूए पहुंच जाते हैं। AC गाड़ी ना हो तो पसीने से बेचारे लतपत हो जाते हैं। काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है ,पर ग़रीब और झुग्गीयों के बच्चे तो ऐसे ही हैं। उन्हे क्या पता ऐश-ओं-आराम क्या होता है। पर भूख लगने पर चेहरे की चमक उड़ जाती है।
   उस बड़ी आबादी में शायद ही किसी के घर चूल्हा जला हो। जब खाने की कोई उम्मीद ना हो और काम का कोइ ज़रिया ना हो तो सुबह-सुबह उठ कर ब्रश करने का क्या फायदा????
   पूरे चार घंटे तक उस REAL INDIA में घूमा। अजीबों-गरीब से सवाल मेरे मन मे आ रहे थे। लेकिन मै एक पत्रकार क्या कर सकता था। झप्पी के अलावा मेरे पास कोई चारा ही नही था। उस दिन पता चला गरीब का दिल कितना बड़ा होता है। झप्पी से इतने खुश होते जैसे कुछ बहुत बड़ा मिल गया हो। एक से बढ़कर एक परेशानियां वहां देखी। कोई दिन भर मे 30 कमा रहा तो कोई 20 रूपये। क्या होगा इन 20-30 रूपयों में?? सरकार ने तो 32 रूपये कमाने वाले को अमीर घोषित कर दिया है ,अब तो गरीब ढूंढने से नही मिलेंगे। 12 बजते ही अब दफ्तर की याद आई की अब वहां भी चलना है। रात में MIKA SINGH का मेहरौली में शो था और फैशन शो का भी कार्यक्रम था वहां पर। केवल रईस लोगों को जाने की इजाज़त थी। पत्रकार होने के नाते मुझे भी वहां बुलाया गया था। रात के 12 बजे तो ऐसी चहल-पहल थी जैसे दिन भी उस रात से शर्मा जाए। बड़े लोगों की पार्टी थी शराब और कवाब का पूरा इंतज़ाम था। कितने लोग तो अपने कुत्तों को भी साथ लाए थे ताकि उसका भी मन दुरुस्त रहे। किसी कुत्ते का नाम TUMMY था तो किसी का नाम BUDDY था। उनकी अलग पार्टी चल रही थी। फिर मुझे इन कुत्तों की कहानी और सुबह मे उस लड़के की कहानी याद आती रही। जब MIKA SINGH ने गाना शुरू किया तो लोगों ने शराब की होली खेली जैसे उन्हें इस असली भारत के बारे मे पता ना हो। वहां भी पप्पी और झप्पी जमकर चल रही थी पर उसका अंदाज़ अलग था। रंगीन रात थी। मस्ती जमकर चल रही थी। पर अफसोस तो यह है, हम लोग इन्ही बड़े लोगों को देखकर सोच लेते है हमारा देश प्रगति पर है............

Edited by- Komal Hemthani LIVE INDIA NEWS

Monday, 19 March 2012

लड़की हूँ अकेली हूँ.....

लड़की हूँ अकेली हूँ.....

लड़की हूँ अकेली हूँ.....
सुना है लड़की आई रहमत आई,
यह सुन के लोगों में क्या शामत आई

बचपन में वह ठोकर खाए, आज भी वह ठोकर खाए
जैसे निठारी, जैसे मंगलौर, जैसी दिल्ली
लड़की हूँ अकेली हूँ......

बड़ी हूई माँ बाप की बोझ हूई,
शादी भी उन्हें करनी है दहेज़ भी नही,
माँ बाप ने जैसे शादी की, सोचा पिया के साथ जाऊँ
पिया भी भुखा दहेज़ का, उसने जाना प्यार का..

फीर से माँगा भीख मूझसे, भीख मूझसे दिया ना गया
दुनिया मे मुझे रहने ना  दिया गया......


यह समाज की एक कड़वी सच्चाइ है इससे रुबरु होना लाज़मी है.........