लड़की हूँ अकेली हूँ.....
लड़की हूँ अकेली हूँ.....
सुना है लड़की आई रहमत आई,
यह सुन के लोगों में क्या शामत आई
बचपन में वह ठोकर खाए, आज भी वह ठोकर खाए
जैसे निठारी, जैसे मंगलौर, जैसी दिल्ली
लड़की हूँ अकेली हूँ......
बड़ी हूई माँ बाप की बोझ हूई,
शादी भी उन्हें करनी है दहेज़ भी नही,
माँ बाप ने जैसे शादी की, सोचा पिया के साथ जाऊँ
पिया भी भुखा दहेज़ का, उसने जाना प्यार का..
फीर से माँगा भीख मूझसे, भीख मूझसे दिया ना गया
दुनिया मे मुझे रहने ना दिया गया......
यह समाज की एक कड़वी सच्चाइ है इससे रुबरु होना लाज़मी है.........
लड़की हूँ अकेली हूँ.....
सुना है लड़की आई रहमत आई,
यह सुन के लोगों में क्या शामत आई
बचपन में वह ठोकर खाए, आज भी वह ठोकर खाए
जैसे निठारी, जैसे मंगलौर, जैसी दिल्ली
लड़की हूँ अकेली हूँ......
बड़ी हूई माँ बाप की बोझ हूई,
शादी भी उन्हें करनी है दहेज़ भी नही,
माँ बाप ने जैसे शादी की, सोचा पिया के साथ जाऊँ
पिया भी भुखा दहेज़ का, उसने जाना प्यार का..
फीर से माँगा भीख मूझसे, भीख मूझसे दिया ना गया
दुनिया मे मुझे रहने ना दिया गया......
यह समाज की एक कड़वी सच्चाइ है इससे रुबरु होना लाज़मी है.........
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