बस यादें रह जाती हैं..... अभी क्यूँ आए शादी मे आते
जब घर से निकलते हैं तो यह नही पता होता आगे क्या होगा। इन्सान सोचता तो बहुत है पर लम्बी चौड़ी सोच रखने वाला इन्सान कभी यह नही सोचता यह ज़िन्दगी कितने दिन की।
घर से निकलता हूं तो माँ की दुआएं लेता हूँ यह सिर्फ इसलिए कि हम सुरक्षित रहें और उन्नती करते रहें। घर से निकलते ही माँ पूरे दिन दूआएं करती है और इस फिक्र मे रहती है कि मेरा लाल कब आएगा। पर सोचिए अगर उसका लाल एक सफेद कपड़े मे लिपटा हुआ लम्बा चौड़ा सोया हुआ हो, और अगर उसका लाल घर से जाए चमचमाती PULSAR गाड़ी से और आए AMBULANCE से तो उस ममता का क्या होगा???
रात को दस बजे दफ्तर मे था। बहुत खुश था कि घर जाउंगा तो निंद अच्छी आएगी क्योंकि दफ्तर के सारे काम अच्छे हो गए थे। क़रीब 12 बजे रात मे घर पहुंचा, खाना खा कर अख़बार पढ़ रहा था, जभी मेरे दोस्त शाकीर ने फोन किया और कहा यार "NIKHIL IS NO MORE"........ मै दंग रह गया और यकीन नही कर रहा था, कि क्या यह सच है। उसी रात मे मै अस्पताल की तरफ रवाना हो गया। पहुंचा तो देखा माहौल मातम का फैला हुआ है। कुछ लोग अपने दोस्त की यादों मे पागल हो रहे थे, कुछ लोग अपने अपनो को देख कर मातम कर रहे थे, वही एक पिता अपने बच्चे की ख़्वाहिशों को याद कर के एक लम्बी आंसूओ की धारा बहा रहा थे, जैसे बरसाती नदी अपने पूरे उफान पर है। पर हम इन्सान कर क्या सकते हैं?? हमारे बस मे कुछ भी नही। जब जिसकी लिखी होती है उसे जाना ही होता है। पर अफसोस तो बहुत होता है। रोना धोना तो लाज़िम है, आखिर दोस्त था अपना। रात दो बजे जब निखील को लेकर उसके घर पहुंचे तो सिर्फ एक ही बात मेरे ज़हन मे आ रही थी की उस माँ का क्या होगा जिसने 24 सालों से फूलों की तरह पाला होगा। फिर मुझे प्रशुन जोशी की एक ही कविता याद आ रही थी।
माँ
लुका छूपी बहुत हुई सामने आजा ना
कहां-कहां ढ़ूढ़ा तूझे
थक गई है अब तेरी मां
आजा सांझ हूई मुझे तेरी फिकर
धूंधला गई देख मेरी नज़र आजा ना
बेटा
क्या बताउं माँ कहां हूं मै
यहां उड़ने को मेरे खुला आसमान है
तेरे किस्सों जैसा भोला सलोना
जहां हैं यहां सपनो वाला
मेरी पंतग तो बेफीकर उड़ रही है मां
डोर कोई लूटे नही बीच से काटे ना
माँ
तेरी राह तके अखीयां
जाने कैसा-कैसा होए जिया
मेरा चंदा तू है कहां........
जब हम निखील के अंतीम संस्कार के बाद उसके घर के बाहर बैठे थे तो, उसके माँ की बस एक ही बात याद आ रही थी "बेटा अभी क्यों आए हो शादी मे आते ना"........ मानो जैसे जीने का दिल नही कर रहा था। माँ का दर्द होता ही ऐसा है।
आख़िर चला गया वह हम सब को छोड़ कर क्यों कि यह ज़ालिम दुनिया शायद उसे पसंद नही आई......
न भूलेगा वह वक्ते-रूखसत किसी का,
मुझे मुड़के फिर इक नजर देख लेना।
रूखसत होते हैं तुमसे लो संभालो यह साज,
छेड़ों नये तराने कि मेरे नगमों को नींद आती है।
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें,
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें।
love you Nikhil तूम हमारी नज़रों हमेशा ज़िंदा हो....
जब घर से निकलते हैं तो यह नही पता होता आगे क्या होगा। इन्सान सोचता तो बहुत है पर लम्बी चौड़ी सोच रखने वाला इन्सान कभी यह नही सोचता यह ज़िन्दगी कितने दिन की।
घर से निकलता हूं तो माँ की दुआएं लेता हूँ यह सिर्फ इसलिए कि हम सुरक्षित रहें और उन्नती करते रहें। घर से निकलते ही माँ पूरे दिन दूआएं करती है और इस फिक्र मे रहती है कि मेरा लाल कब आएगा। पर सोचिए अगर उसका लाल एक सफेद कपड़े मे लिपटा हुआ लम्बा चौड़ा सोया हुआ हो, और अगर उसका लाल घर से जाए चमचमाती PULSAR गाड़ी से और आए AMBULANCE से तो उस ममता का क्या होगा???
रात को दस बजे दफ्तर मे था। बहुत खुश था कि घर जाउंगा तो निंद अच्छी आएगी क्योंकि दफ्तर के सारे काम अच्छे हो गए थे। क़रीब 12 बजे रात मे घर पहुंचा, खाना खा कर अख़बार पढ़ रहा था, जभी मेरे दोस्त शाकीर ने फोन किया और कहा यार "NIKHIL IS NO MORE"........ मै दंग रह गया और यकीन नही कर रहा था, कि क्या यह सच है। उसी रात मे मै अस्पताल की तरफ रवाना हो गया। पहुंचा तो देखा माहौल मातम का फैला हुआ है। कुछ लोग अपने दोस्त की यादों मे पागल हो रहे थे, कुछ लोग अपने अपनो को देख कर मातम कर रहे थे, वही एक पिता अपने बच्चे की ख़्वाहिशों को याद कर के एक लम्बी आंसूओ की धारा बहा रहा थे, जैसे बरसाती नदी अपने पूरे उफान पर है। पर हम इन्सान कर क्या सकते हैं?? हमारे बस मे कुछ भी नही। जब जिसकी लिखी होती है उसे जाना ही होता है। पर अफसोस तो बहुत होता है। रोना धोना तो लाज़िम है, आखिर दोस्त था अपना। रात दो बजे जब निखील को लेकर उसके घर पहुंचे तो सिर्फ एक ही बात मेरे ज़हन मे आ रही थी की उस माँ का क्या होगा जिसने 24 सालों से फूलों की तरह पाला होगा। फिर मुझे प्रशुन जोशी की एक ही कविता याद आ रही थी।
माँ
लुका छूपी बहुत हुई सामने आजा ना
कहां-कहां ढ़ूढ़ा तूझे
थक गई है अब तेरी मां
आजा सांझ हूई मुझे तेरी फिकर
धूंधला गई देख मेरी नज़र आजा ना
बेटा
क्या बताउं माँ कहां हूं मै
यहां उड़ने को मेरे खुला आसमान है
तेरे किस्सों जैसा भोला सलोना
जहां हैं यहां सपनो वाला
मेरी पंतग तो बेफीकर उड़ रही है मां
डोर कोई लूटे नही बीच से काटे ना
माँ
तेरी राह तके अखीयां
जाने कैसा-कैसा होए जिया
मेरा चंदा तू है कहां........
जब हम निखील के अंतीम संस्कार के बाद उसके घर के बाहर बैठे थे तो, उसके माँ की बस एक ही बात याद आ रही थी "बेटा अभी क्यों आए हो शादी मे आते ना"........ मानो जैसे जीने का दिल नही कर रहा था। माँ का दर्द होता ही ऐसा है।
आख़िर चला गया वह हम सब को छोड़ कर क्यों कि यह ज़ालिम दुनिया शायद उसे पसंद नही आई......
न भूलेगा वह वक्ते-रूखसत किसी का,
मुझे मुड़के फिर इक नजर देख लेना।
रूखसत होते हैं तुमसे लो संभालो यह साज,
छेड़ों नये तराने कि मेरे नगमों को नींद आती है।
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें,
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें।
love you Nikhil तूम हमारी नज़रों हमेशा ज़िंदा हो....
No comments:
Post a Comment