लो सून लो एक और बात........... भले ही लागू हो ना हो।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में सर्कस में बच्चों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। यानि अब चौदह वर्ष से कम आयु के बच्चों का सर्कस में काम करना व उनसे जबरन काम करवाना दोनो ही अपराध ही श्रेणी में आंएगे। बाल-मजदूरी व शोषण पर लगाम लगाने के लिए ही यह कदम उठाया गया है। सरकार व प्रशासन यूं तो समय-समय पर बाल शोषण को रोकने के लिए नए नए कानून व प्रावधानों का सहारा लेती रही है। लेकिन क्या यह कहना उचित होगा कि वह अपने उद्देय में सफल हो पाई है? क्या वास्तव में देश में व्याप्त बाल-मजदूरी व बाल शोषण पर पूरी तरीके से रोक लग पाई है?
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में सर्कस में बच्चों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। यानि अब चौदह वर्ष से कम आयु के बच्चों का सर्कस में काम करना व उनसे जबरन काम करवाना दोनो ही अपराध ही श्रेणी में आंएगे। बाल-मजदूरी व शोषण पर लगाम लगाने के लिए ही यह कदम उठाया गया है। सरकार व प्रशासन यूं तो समय-समय पर बाल शोषण को रोकने के लिए नए नए कानून व प्रावधानों का सहारा लेती रही है। लेकिन क्या यह कहना उचित होगा कि वह अपने उद्देय में सफल हो पाई है? क्या वास्तव में देश में व्याप्त बाल-मजदूरी व बाल शोषण पर पूरी तरीके से रोक लग पाई है?
सर्कस में काम कर रहे बच्चों की ही बात करें तो, बड़े धड़ल्ले से यहां बच्चों का शोषण किया जाता है। डरा -धमका कर व मार-पीटकर उनसे काम लिया जाता है। सर्कस का पूरा दारोमदार ही एक तरीके से बच्चों पर होता है। जितना छोटा बच्चा, सर्कस में अजब-गजब तरीके के कर्तब दिखाएगा, दर्शकों की तालियों व भीड़ के साथ साथ उतना ही पैसा वह सर्कस कमा पाएगा। इसलिए बड़ी संख्या में अगवा किए गए बच्चों को सर्कस में बेच दिया जाता है जहां उनसे गुलामों की भांति काम लिया जाता है। वर्ष 2009 के एक सर्वेक्षण में खुलासा हुआ था कि घर से भागे हुए व गुमशुदा बच्चों की एक बड़ी संख्या ऐसे ही सर्कसों में पाई जाती है। सिर्फ सर्कस में ही नहीं, फैक्ट्रियों, ढाबों व कारखानों में बच्चों की एक बड़ी फौज को गैरकानूनी तरीके से काम पर लगाया जाता है। जिनसे लगातार चौबीस घंटे काम लिया जाता है। सरकार को चाहिए कि वह बाल श्रम कानून को और भी सख्त बनांए जिससे कि बच्चों के शोषण पर पूर्णतः रोक लग सके। इसे लागू करने की जिम्मेदारी भी पूर्णतः सरकार और अदालत पर ही है। बच्चों के मूल अधिकारों का संरक्षण करने के लिए यह जरूरी है कि सरकार इस क्षेत्र में बच्चों को काम पर रखने पर प्रतिबंध लगाती अधिसूचना जारी करे।
देशभर के कई सर्कसों में बच्चों से गैरकानूनी तरीके से काम कराया जा रहा है और कई जगह तो सर्कस की आड़ में उनका यौन शोषण तक हो रहा है। खासतौर पर मध्यपूर्व और नेपाल से बड़ी संख्या मे बच्चों को सर्कस में काम दिलाने के प्रलोभन से भारत लाया जाता है और इनमें से कई को वेयावृति में धकेल दिया जाता है। आजकल सर्कस उद्योग में बच्चों का इस्तेमाल एक तरीके से चलन बन गया है। जहां सर्कस की आड़ में उनका यौन शोषण किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को जहां एक तरफ बाल श्रम के विरोध में एक पहल के रूप में देखा जा रहा हैं, वहीं दूसरी तरफ इस पर सवालिया निशान भी लगा दिए गए है। कुछ लोगों का तर्क है कि जिस तरीके से फिल्म उद्योग, विज्ञापनों व मॉडलिंग की दुनिया में बच्चों का बढ़-चढ़कर इस्तेमाल किया जा रहा है, ठीक उसी तरीके से सर्कस में भी बच्चों का इस्तेमाल किया जा रहा हैं, सर्कस भी एक कला है, और इसे बचपन से सीखना पड़ता है। परंतु वास्तविकता तो यह है कि चाहे वह किसी फिल्म का सेट हो या फिर सर्कस का मंच। हर तरफ जमकर बच्चों का शोषण किया जाता है। मात्र मारना-पीटना व मानसिक यातनांए देकर काम करवाना ही बाल शोषण के दायरे में नहीं आता बल्कि आवश्यकता से अधिक काम लेना व कानून व प्रावधानों द्वारा निहित तय घंटों के विरल लगातार चौबीसों घंटें काम लेना भी इसकी कोटि में आता है। सर्कस में समाज के उस गरीब तबके के बच्चे काम करते हैं, जो पूर्ण रूप से लाचार व बेबस है और अगर ऐसे में बच्चों के लिए एक पुनर्वास नीति बनाए जाने की घोषणा की जाती है तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता।
अब देखना यह है कि सरकार किस तरह...................
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